🚩 हमारे समाज में, विशेषकर वैष्णव सम्प्रदाय के अनेक लोग, शास्त्रों का अध्ययन किए बिना ही यह दावा कर देते हैं कि शिव एक कुरूप, कुवर्ण और ऐश्वर्यहीन देवता हैं, जिनके पास कुछ भी नहीं है—जो केवल कैलास पर्वत, जंगल और श्मशान में निवास करते हैं। इसी प्रकार की अज्ञानता के कारण लोग शिव को एक सामान्य देवता समझ बैठते हैं। किन्तु सनातन शास्त्रों के अनुसार परमेश्वर शिव विश्वब्रह्माण्ड के सर्वोच्च सौन्दर्य, महिमा और ऐश्वर्य के अधिष्ठाता हैं। उनके समान दूसरा कोई नहीं, और वही सभी देवी-देवताओं को रूप–सौन्दर्य तथा ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। आइए आज हम वेद, पुराण, उपनिषद तथा इतिहास-ग्रन्थ महाभारत से इसके प्रमाणों को जानें— ♦️ प्रथम प्रमाण — भस्मजाबाल उपनिषद से ✨ “कैलासशिखरावासमोंकारस्वरूपिणं महादेवं… (पूर्ण मंत्र)… एकमाशास्यं भगवन्तं शिवं प्रणम्य।” (भस्मजाबाल उपनिषद 1/1) अर्थ:— जो कैलास के शिखर पर निवास करते हैं, ओंकारस्वरूप, जिन्होंने उमा को अपने अर्धभाग में धारण किया है; जिनके मस्तक पर अर्धचन्द्र शोभित है; सूर्य-चन्द्र-अग्नि जिनके नेत्र हैं; जो अनन्त तेजस्विता से प्रकट होते हैं; बाघम्बरधारी, हाथ में ...
🌿 शिवः ॐ तत्सत्। 🌿 शास्त्रों के अध्ययन और तत्त्वज्ञान के अभाव में कुछ लोग — विशेषकर कुछ वैष्णव और आर्य नामाज़ी कहलाने वाले —परमेश्वर शिव को “पशुपति” शब्द के द्वारा केवल पशु-पक्षी और जीव-जंतुओं के अधिपति मानते हैं। परंतु आइए आज वेद, शैव आगम, उपनिषद् और पुराण शास्त्रों से यह समझें कि “पशुपति” शिव का वास्तविक, शास्त्रीय और दार्शनिक अर्थ क्या है। तो आरंभ करें 👇 🔱 परमेश्वर शिव को “पशुपति” क्यों कहा गया — शास्त्रीय प्रमाण एवं तात्त्विक व्याख्या 🔱 ☘️ प्रथम प्रमाण — शिवमहापुराण से। ☘️ इत्याकर्ण्य वचस्तस्य महेशस्य परात्मनः। तथेति चाब्रुवन्देवा हरिब्रह्मादयस्तथा ॥ २२ ॥ तस्माद्वै पशवः सर्वे देवासुरवरा: प्रभोः। रूद्रः पशुपतिश्चैव पशुपाशविमोचकः ॥ २३ ॥ तदा पशुपतीत्येतत् तस्य नाम महेशितुः। प्रसिद्धमभवद्यद्द्धा सर्वलोकेषु शर्मदम् ॥ २४ ॥ 📚 (स्रोतः — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, युद्धकाण्ड, अध्याय ९, श्लोक २२–२४) भावार्थ:— सनत्कुमार ने कहा — जब महेश्वर परमात्मा के इन वचनों को देवगण, हरि (विष्णु) और ब्रह्मा आदि ने सुना, तो उन्होंने कहा — “तथास्तु” अर्थात् ऐसा ही हो। ॥२२॥ इस कारण, हे प्रभो! सभी देवता औ...
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